महिला स्वैच्छिक संगठनो के अध्ययन में शोध पद्धति की भूमिका

 

मनीषा यदु1, हेमलता बोरकर वासनिक2

1शोधार्थी, समाजषास्त्र एवं समाजकार्य अध्ययनषाला, पं रविषंकर शुक्ल वि.वि. रायपुर (..)

2सह प्राध्यापक, समाजषास्त्र एवं समाजकार्य अध्ययनषाला, पं रविषंकर शुक्ल वि.वि. रायपुर (..)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

महिला स्वैच्छिक संगठन से आषय ऐसे संगठनो से है जिसमें कि महिलाएं अपनी स्वयं की इच्छा से एक ऐसे संगठन का निर्माण करती है जो कि महिलाओं पर की जा रही हिंसा, क्रूरता, अत्याचार दहेज के कारण की जा रही हत्या, छेड़छाड़ की घटना, बलात्कार, घर के पुरूष सदस्य द्वारा प्रताड़ित किया जाना, कार्यस्थल पर होने वाले अपराध, चौक-चौराहों पर होने वाले अपराध, आर्थिक समस्याओं का सामना आदि प्रकार के घटनाएं जो महिला को प्रभावित करती है के खिलाफ कार्य करती है। इन्हीं संगठनो में से एक संगठन है छत्तीसगढ़ की बालोद जिले की महिला कमाण्डों जिसमें ग्रामीण घरेलू महिलाएं स्वैच्छिक समूह बनाकर समाज/गाँव में व्याप्त सामाजिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास करती है। महिला कमाण्डों नाम का यह स्वैच्छिक संगठन महिलाओं के प्रति होने वाले ऊपर वर्णित सभी अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाती है, और मुख्यतः षराब पीने वाले पुरूष सदस्य तथा जो शराब पीकर अनुचित व्यवहार करते है उन पर नियंत्रण करने का प्रयास करती है और समाज में व्याप्त षराबखोरी की समस्याओं को जड़ से समाप्त करने के लिए शराबबंदी का मुहिम चलाती है। इस प्रकार इस महिला स्वैच्छिक संगठन का समाज के विकास में क्या भूमिका है का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए षोधकर्ता को शोध पद्धति की आवष्यकता होती है, क्योंकि षोध पद्धति शोधकर्ता के कार्य को वैज्ञानिक बनाने के लिए दिषा प्रदान करती है। प्रस्तुत अध्ययन के द्वारा महिला स्वैच्छिक संगठनों के अध्ययन में षोध पद्धति की भूमिका को ज्ञात करना है। इस शोध पत्र में वर्णात्मक शोध प्रविधि का प्रयोग किया गया है, वर्णनात्मक शोध का उद्देष्य किसी घटना या स्थिति का सम्पूर्ण एवं सही-सही चित्रण करना है। किसी भी शोध पद्धति के चयन करने से एवं उसके चरणबद्ध तरीके से पालन करने से षोध में मितव्ययता और पक्षपात से बचा जा सकता है। षोध पद्धति यह निर्देष देता है कि षोधकर्ता जो भी जानना चाहता है उसका उद्देष्य स्पष्ट षब्दो में हो, तथा अपने शोध करने से पहले विधियों का निर्धारण एवं पूर्व में हुए अध्ययन को ठीक से पढ़कर समझ ले तथा निदर्ष की मात्रा एवं इसकी चयन विधि का निर्धारण कर ले उसके पश्चात् अध्ययन के दौरान जो भी तथ्य सामने आते हैं उनकी विष्वसनीयता एवं प्रामाणिकता की जांच करना है।

 

KEYWORDS: महिला स्वैच्छिक संगठन, महिला कमाण्डों, शोध पद्धति भूमिका।

 

 


INTRODUCTION:

महिला स्वैच्छिक संगठन उन संगठनों को कहते है जो उत्पीड़ित, सताई हुई महिलाओं एवं लड़कियों को उन्हें स्वयं की पहचान कराने में सहयोग करती है एवं इन मुद्दों पर महिलाओं में जागृति, प्रेरणा नई आषा का संचार करने में सहायता करती है। सम्पूर्ण भारत देष में अभी ऐसे अनेक महिला स्वैच्छिक संगठन कार्यरत है। षोधकर्ता का रूझान इस ओर आया कि महिलाओं की समस्याओं से संबंधित विषय पर अध्ययन किया जाए अतः इस हेतु ऐसी कौन सी समस्या है जिसका चयन किया जाए। तथा षोध की पद्धति क्या होगी, इत्यादि का निर्धारण षोध की सम्पूर्ण प्रक्रिया के चरण का भली भांति अध्ययन तथा उसका पालन करके ही निष्चित किया जा सकता है। इसलिए प्रत्येक षोधार्थी को अपने अध्ययन को वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए अनुसंधान प्रक्रिया के चरण से होकर गुजरना पड़ता है।

 

प्रस्तुत षोध पत्र में महिला स्वैच्छिक संगठन के अंर्तगत छत्तीसगढ़ की बालोद जिले की महिला कमाण्डों को अध्ययन विषय के रूप में चयन किया गया है। जिसे षोध पद्धति का अनुसरण करते हुए कार्य को सम्पूर्ण किया जाएगा। विषय को षोध के साथ जोड़ने से पहले थोड़ा यह समझ लेना ठीक होगा कि षोध वास्तव में होता क्या है- “विस्तृत अर्थ में षोध (त्मेमंतबी) किसी भी क्षेत्र मेंज्ञान की खोज करनायाविधिवत अन्वेषणकरना होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान में वैज्ञानिक पद्धति का सहारा लेते हुए षोधकर्ता की जिज्ञासा का समाधान करने की कोषिष की जाती है। नवीन तथ्यों की खोज और पुराने तथ्यों एवं सिद्धांतों का पुनः परीक्षण करना, जिससे की नए तथ्य प्राप्त हो सकंे, उसे षोध कहते है, इस प्रकार जब एक षोधकर्ता यह समझता है कि वास्तव में वैज्ञानिक क्रमबद्ध षोध होता क्या है तब ही वह समाजोपयोगी षोध कर सकता है। इसलिए इस षोधपत्र के षोधकर्ता ने भी षोध समस्या (महिला स्वैच्छिक संगठन) के अध्ययन में षोध की पूरी प्रक्रिया को प्रयोग किया है। क्योंकि षोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक तथ्यों का संकलन कर व्यवस्थित सावधानीपूर्वक सूक्ष्म बुद्धि से तथ्यों का अवलोकन कर नए तथ्यों या सिद्धान्तों का उद्घाटन किया जाता है।

 

सामाजिक अनुसंधान का अर्थः- ’षोधअंग्रेजी षब्द त्मेमंतबी का पर्याय है इसका अर्थ पुनः खोज होता है अर्थात् जो घटना, क्रियाकलाप या वस्तु पहले से विधमान है, उसके बारे में नए सिरे से छानबीन, जांच-पड़ताल करना हीरिसर्चहै। षोध के द्वारा हम कुछ नया आविष्कृत कर उस ज्ञान परम्परा में कुछ नए सार्थक तथ्यों को षामिल करते है या पूर्व स्वीकृत निष्कर्षों में संषोधन करते है। सामाजिक अनुसंधान से तात्पर्य ऐसी गवेषणा विधि से है जो सामाजिक अन्तर्क्रिया की प्रक्रियाओं और सामाजिक समूहों के अध्ययन पर केन्द्रित होती है। इसकी प्रकृति अनुभवपरक होती है जिसके द्वारा व्यक्तियों की अन्तर्क्रियाओं और सामाजिक प्रघटनाओं का प्रेक्षण-परीक्षण कर सिद्धान्त की रचना करने का प्रयास किया जाता है।

 

सामाजिक अनुसंधान की परिभाषाः-

फिषर (1944) ने कहा है,- ’’सामाजिक षोध किसी सामाजिक घटना पर प्रयोग की जाने वाली एक एक ऐसी व्यावहारिक कार्य-प्रणाली, जिसका उद्देष्य किसी समस्या का समाधान अथवा किसी प्राक्कल्पना का परीक्षण या नवीन तथ्यों की खोज या विभिन्न तथ्यों के बीच नवीन संबंधो की खोज करना है।’’

मोजर (1961) ने लिखा है, -’’सामाजिक घटनाओं तथा समस्याओं के बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करने हेतु की गई व्यवस्थित गवेषणा को सामाजिक षोध कहते हैं।’’

 

सामाजिक षोध की प्रक्रिया -

सभी सामाजिक विज्ञानों में षोध संबंधी लगभग उन्हीं नियमों, प्रक्रिया, कार्यविधि और चरणों का प्रयोग किया जाता है जो वैज्ञानिक विधि के आधार हैं। अध्ययन संबंधी विषय-वस्तु की प्रकृति के अनुसार इनमें कुछ हेर-फेर संभव है। इस षोध पत्र में भी षोध समस्या के आवष्यकता अनुसार वैज्ञानिक षोध की उन्ही प्रक्रियाओं का प्रयोग किया गया है जिसका हम नीचे क्रमषः वैज्ञानिक पद्धति के चरण और महिला स्वैच्छिक संगठन के साथ जोड़ते हुए प्रस्तुतीकरण करेंगे।

प्रथम चरण - षोध समस्या का स्पष्टीकरण, इस चरण का पालन करते हुए षोधकर्ता ने अपने रूचि के अनुरूप महिलाओं से संबंधित विषय को चुना जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की एक महिला स्वैच्छिक संगठन ’’महिला कमाण्डो’’ का चयन किया जो महिलाओं की सुरक्षा हेतु मुहिम चलाती है। महिला कमाण्डों षराबबंदी का कार्य, महिलाओं/लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाओं के रोकथाम करने का कार्य, घरेलू हिंसा के मामलों को सुलझाने का कार्य, बालिका षिक्षा को बढ़ावा, महिलाओं में आत्मसुरक्षा एवं आत्मविकास के वृद्धि हेतु प्रषिक्षण, महिलाओं की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने हेतु आर्थिक गतिविधियां, समाज एवं गांव के विकास के लिए अनैतिक कार्यांे का रोकथाम आदि कार्य करती है। इस स्वैच्छिक संगठन की महिलाएं पुलिस विभाग की या अन्य किसी सरकारी विभाग की कर्मचारी नही होती है, बल्कि वे सभी गांव की आम/नागरिक ग्रामीण महिलाएं होती है, जिन्होंने बरसों से चली रही सामाजिक विचलनों, जिसे महिलाओं को सहना पड़ता को समाप्त करने का प्रयास करती है।

 

द्वितीय चरण - उपलब्ध साहित्य की समीक्षा, षोध समस्या को अधिक स्पष्ट करने और इसे एक निष्चित आकार देने के लिए एक षोधकर्ता अपनी समस्या से संबंधित उपलब्ध साहित्य और सिद्धान्तों का अध्ययन-मनन करता है। अध्ययन-मनन से तात्पर्य यह जानना होता है कि जिस विषय पर षोध की जा रही है, उससे संबंधित पहले कोई षोध हुई है, उसके क्या निष्कर्ष रहंे, उसमें किन पद्धतियों का प्रयोग किया गया, पिछले षोध में किन कठिनाईयों का उल्लेख किया गया? आदि। षोध साहित्य के पुनरावलोकन से षोधकर्ता को अपने अध्ययन के लिए एक दिषा निर्देष मिलता है। षोध साहित्य के पुनरावलोकन की आवष्यकता वही होती है जहां मुद्दे दीर्घकालीन हो, जब षोध ऐसा होता है जिसमें तात्कालिक विषय पर तुरन्त निष्कर्ष चाहिए, तब इसकी आवष्यकता नहीं होती है। चूकि इस षोधपत्र का षीर्षक महिला स्वैच्छिक संगठन जिसमें की विषेष तौर पर महिला कमाण्डों है, एक नयी अवधारणा वाला विषय है जिसमें अभी तक उसी मूल्यों को लेकर कोई षोध नही हुआ है। इसलिए षोधकर्ता के द्वारा अन्य महिला स्वैच्छिक संगठन, पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका, ग्रामीण विकास में महिलाओं की भूमिका, महिला स्वं-सहायता समूह, महिला सषक्तिकरण से संबंधित अन्य विषयों का अध्ययन किया गया है। जिनमें से कुछ निम्न है-

 

रामचन्द्रन बालकृष्णन(2008) ने महिला सषक्तिकरण में स्वयं सहायता समूह के प्रभाव का अध्ययन कन्याकुमारी जिला कुरूक्षेत्र में पाया कि स्वयं सहायता समूह में षामिल होने के बाद, महिलाओं ने सामाजिक और आर्थिक रूप से स्थिति में सुधार किया है। इस अध्ययन में यह पाया गया है कि स्वयं सहायता समूह हमारे देष के ग्रामीण क्षेत्रो में सामाजिक आर्थिक क्रांति ला सकते हैं। स्वयं सहायता समूह ने स्थयी संपत्ति का उत्पादन किया है और उनके सामाजिक दृष्टिकोण और स्थिति को बदलने में सहायता की हैं, तथा महिला सषक्तिकरण, सामाजिक एकजुटता और गरीबों की सामाजिक आर्थिक बेहतरी के लिए कार्य किया हैं।

 

सोनकर बेबी (2019) ने ग्रामीण महिलाओं में सामाजिक- आर्थिक रूपान्तरण का एक समाजवैज्ञानिक अध्ययन मंे यह पाया कि षिक्षा, संचार के द्वारा ग्रामीण महिलाओं के प्रस्थिति में बहुत अधिक या कुछ सीमा तक सकारात्मक रूपान्तरण आया है षिक्षित महिलाओं को परिवार एवं समाज में उच्च स्थान प्राप्त हुआ है, रोजगार के अवसर में वृ़ि़द्ध हुई है परिवार तथा अन्य स्थानों पर उनके निर्णय लेने की क्षमता में तथा कही भी लेन-देन का हिसाब स्वयं करने की क्षमता मंे वृ़ि़द्ध हुई है। अधिकतर महिलाओं ने इस तथ्य का समर्थन किया है कि महिलाओं का पुरूषों पर आर्थिक रूप से निर्भरता ही उनकी उपेक्षा का प्रमुख कारण है। कम आयु वर्ग की महिलाओं ने इस तथ्य को पूर्णतः स्वीकार किया है कि शैक्षणिक तथा आर्थिक सषक्तिकरण में सकारात्मक रूपान्तरण के बावजूद वे अपने आय को खर्च करने के लिए स्वतंत्र नही है जो पुरूष प्रधान, सामाजिक रूढ़िवादी सोच एवं संकीर्ण मानसिकता को दर्षाता है।

 

महेष्वरी उमा (2020) इन्होनें महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी का अध्ययन चेन्नई षहर के विषेष सन्दर्भ में किया हैं। इस अध्ययन का एक प्रमुख उद्देष्य राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं की राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी स्तर का पता लगाना था और कौन सी बाधाएं उन्हे राजनीति में षामिल होने से रोकती है। 90 प्रतिषत से अधिक महिलाओं में बुनियादी राजनीतिक जागरूकता है महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी 70 प्रतिषत से अधिक है अध्ययन से पता चलता है कि महिलाएं भाग लेने की इच्छुक है और राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी के महत्व को महसूस कर चूकी हैं। परन्तु महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियां एवं महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल वाली राजनीतिक संस्कृति के कारण राजनीति में षामिल नहीं हो पाती है।

 

तृतीय चरण - षोध प्राक्कल्पना की रचना, एक षोध उपकल्पना आनुभाविक परीक्षण हेतु निर्मित एक एक ऐसा कथन होता है जो दो या अधिक चरों के बीच संबंधो को व्यक्त करता है और सामान्यतः इसेअगरऔरतबसे प्रस्तुत किया जाता है प्राक्कल्पना मात्र संभावना को व्यक्त करती है। तथ्यों के संकलन के आधार पर इसके परीक्षण के बाद ही इसे सही या गलत बताया जा सकता है। एक वैज्ञानिक उपकल्पना का स्पष्ट, विषिष्ट और परीक्षण योग्य होना जरूरी है। चूकीं इस शोध पत्र का विषय एक नया अवधारणा है अतः षोधकर्ता ने सामाजिक शोध प्रक्रिया के इस चरण का पालन नहीं किया है और किसी भी प्रकार की उपकल्पना का निर्माण नहीं किया है।

 

चतुर्थ चरण- षोध प्ररचना का निर्माण, षोध अभिकल्प यारिसर्च डिजाइनसे तात्पर्य अनुसंधान की योजना ;त्मेमंतबी चसंदद्ध से है। जैसा कि हम जानते है षोधकार्य सर्वथा नियोजित प्रक्रिया है। किसी भी कार्य को करने से पहले उसके लिएयोजनाबनाना कार्य की सफलता को बढ़ा देता है। इसे हम सफलता की गांरटी भी कहे तो कुछ अधिक नहीं होगा। इसे अनुसंधान की व्यूह रचना भी कहा जाता है। इसका निर्माण इसलिए भी किया जाता है ताकि षोधकर्ता को प्रमाणिक और विष्वसनीय परिणामों तक पहूंच सकें। एक सामाजिक षोधकर्ता के षोध प्ररचना में साधारणतः निम्न बातों को सम्मिलित किया जाता है जिसका इस षोधपत्र के षोधकर्ता ने भी पालन किया है-

 

1.  अनुसंधान कार्य का क्षेत्र:- षोध अध्ययन का क्षेत्र छत्तीसगढ़ राज्य का बालोद जिला है, यह जिला दुर्ग जिला के पुर्नगठन के बाद जनवरी 2012 से अस्तित्व में आया है, बालोद षहर की राजधानी रायपुर से दूरी 100 कि.मी. है, जिला बालोद का कुल रकबा 352700 हेक्टेयर है, जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 8,26,165 है, जिला बालोद वन, जल, एवं खनिज संसाधन जैसे प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न है। भारतीय इस्पात प्राधिकरण द्वारा संचालित दल्ली राजहरा की लौह अयस्क की खदाने भी इसी जिले में आती हैं। यह जिला धान, चना, गन्ना एवं गेहूं जैसे उपज के लिए जाना जाता है। इस जिले में एक षक्कर कारखाना भी है। इस जिले में तान्दुला, खरखरा एवं गोंदली बांध कृषि कार्य में सिंचाई के स्त्रोत है। यहां गांेड और हल्बा जनजाति की अधिकता पायी जाती है।

 

2. तथ्य संकलन की विधि:- इस शोध पत्र के लिए तथ्य संकलन हेतु साक्षात्कार-अनुसूची उपकरण एवं अवलोकन प्रविधि का चयन किया गया है, साथ ही अध्ययन विषय से संबंधित द्वितीयक स्त्रोतों तथा औपचारिक एवं अनौपचारिक वार्तालाप के द्वारा भी तथ्यों का संकलन किया गया है।

 

3. प्रतिदर्श की मात्रा और प्रतिचयन विधि का चुनावः- इस षोध विषय में उत्तदाता बालोद जिले में महिला कमाण्डो के रूप में कार्य कर रही महिलांए एवं वहां के स्थानीय निवासी है, प्रतिदर्श के रूप में बालोद जिले के कुल 5 विकासखण्ड में से, बालोद विकासखण्ड के ग्रामों का चयन महिला कमाण्डो की उपलब्धता एवं संख्या तथा जिला मुख्यालय से दूरी के आधार पर 6 ग्रामों का चयन उद्देष्य पूर्ण निर्दषन के आधार पर किया गया है। जिसमें सभी 6 गांव की महिला कमाण्डों एवं उन ग्रामों में उत्तरदाता परिवार की संख्या का 8 प्रतिषत निदर्ष लिया गया है। इस प्रकार कुल 270 उत्तरदाताओं से साक्षात्कार अनुसूची भरकर विषय से संबंधित जानकारी ली गई है।

4. शोध उपकरण:- षोध उपकरण के रूप में साक्षात्कार अनुसूची तैयार करके, उत्तरदाताओं से भरवाकर तथ्य का संकलन किया गया है। साक्षात्कार अनुसूची में षोध का जो उद्देष्य है उसके अनुरूप प्रष्नों का निर्माण किया गया है।

5. तथ्यों के प्रकार का चुनाव और उनके स्त्रोतों का निर्धारण:- प्रस्तुत षोध में तथ्य संकलन हेतु प्राथमिक स्त्रोतो का प्रयोग किया गया है, इसके अलावा द्वितीयक स्त्रोतो के रूप में सामाचार पत्र-पत्रिका, इंटरनेट, विभागीय रिकार्ड आदि का प्रयोग किया गया है, तथा व्यक्तिगत अध्ययन, करके भी तथ्य एकत्रित किया गया है।

6. षोध की तकनीक और उपकरण का पूर्व-परीक्षणः- षोधकर्ता के लिए वृहद तथ्य संकलन करने से पहले यह आवष्यक होता है कि वह अपने द्वारा बनाये गए उपकरण तकनीक का पूर्व परीक्षण कर ले। सभी प्रष्न उद्देष्य के अनुरूप होना चाहिए, भाषा में सरल, प्रष्नों का क्रम निर्धारित करने में तार्किकता होनी चाहिए, साक्षात्कार अनुसूची अधिक लम्बी बहुत छोटी होनी चाहिए।

7. पूर्वगामी सर्वेक्षण ;च्पसवज ेजनकलद्ध वृहद रूप से षोध करने से पहले षोधकर्ता को उसके कुछ अंष का अध्ययन अवष्य कर लेना चाहिए। तत्पष्चात् यदि वह षोधकार्य आगे बढ़ाने और गहन अध्ययन करने के योग्य लगता है तभी निदर्ष के अनुसार पूरा षोध कार्य पूर्ण करना चाहिए।

 

पंचम चरण - तथ्यों का संकलन एवं विष्लेषण, किसी भी वैज्ञानिक षोध का यह मुख्य चरण होता है, षोध प्ररचना का निर्माण कर लेने के बाद षोधकर्ता षोधकर्ता षोध क्षेत्र में जाकर तथ्यों का संकलन करता है। इस षोध पत्र के विषय से संबंधित तथ्यों को स्वंय षोधकर्ता ने वहां जाकर एकत्रित किया है। तथ्यों का संकलन ही षोध का अंत नही होता है, उन तथ्यों का सारणीयन, वर्गीकरण, विष्लेषण करना महत्वपूर्ण कार्य होता है। तथ्यों के विष्लेषण के लिए मुख्य रूप से तीन प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाता है:

() तथ्यों का सम्पादन ;म्कपजपदह िकंजंद्ध

() तथ्यों का संकेतन ;ब्वकपदह िकंजंद्ध

() तथ्यों का वर्गीकरण एवं सारणीयन ;ब्संेेपपिबंजपवद ंदक ज्ंइनसंजपवद िकंजंद्ध

 

इन्ही विधियों का प्रयोग करते हुए षोधकर्ता के द्वारा इस षोधपत्र के विषय के तथ्यों के संकलन से जो प्राप्त हुआ है उसका सम्पादन, संकेतन, वर्गीकरण किया गया है।

 

शष्टम चरण - निष्कर्ष निकालना, छठा चरण वह होता है जिसके प्राप्ति के लिए सम्पूर्ण कार्य किया जाता है। निष्कर्ष सम्पूर्ण षोध का निचोड़ होता है। निष्कर्ष में साक्षात्कार अनुसूची, प्रष्नावली के माध्यम से प्राप्त तथ्यों का विष्लेषण, वर्गीकरण, सारणीयन के बाद परिणामों को लिखा जाता है। प्रस्तुत षोध समस्या महिला स्वैच्छिक संगठन के अंर्तगत महिला कमाण्डों के अध्ययन से पता चला है कि यह संगठन गांव के विकास में एवं असामाजिक गतिविधियों को कम करने में सहायक सिद्ध हुआ है। किन्तु महिला कमाण्डों को उनके कार्य का किसी भी प्रकार का कोइ भी पारिश्रमिक नही दिया जाता है इसलिए उनकों आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

 

सप्तम चरण - प्रतिवेदन तैयार करना और उसका प्रकाषन, उपरोक्त चरणों का पालन करने के बाद सम्पूर्ण षोध की एक रिपोर्ट (प्रतिवेदन) तैयार किया जाता है जिसमें षोध के निष्कर्षों के आधार पर भविष्य की संभावनाओं की व्याख्या की जाती है तथा सुझाव भी दिये जाते है। ये सुझाव समस्या के समाधान और आगे इस विषय में षोध करने वालों के लिए होता है। साथ ही रिपोर्ट में उन कठिनाईयों का भी उल्लेख किया जाता है जो षोध के दौरान षोधकर्ता के षोधमार्ग में उत्पन्न हुई है।

 

निष्कर्ष -षोध पद्धति किसी भी षोध कार्य में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है यह किसी इमारत के ढं़ाचे की तरह होती है जिस पर किसी भी इमारत का अस्तित्व उसका, स्वरूप, आकार टिका होता है। षोध पद्धति के अभाव में षोधकार्य का स्वरूप उसकी दषा दिषा का निर्धारण संभव नही इसके बिना षोधकार्य की उपयोगिता षून्य हो जाएगी। उचित षोध पद्धति हमें वैज्ञानिक विधि से किसी समस्या के स्पष्टीकरण, उसकी व्याख्या कर मूल कारकों तक पहुंचने में हमारी सहायता करती है। समस्या से जुड़े पूर्व अध्ययनों की जांच कर हम प्राक्क्ल्पना निर्माण उसके परीक्षण हेतु सूक्ष्म क्षेत्रों को क्रमबद्ध कर आवष्यक प्रतिदर्ष मात्रा संकलन विधि का निर्धारण करते हुए विष्लेषण की आधुनिक विधि का प्रयोग करते है। फलस्वरूप हमें इच्छित षोध परिणाम प्राप्त होता है, अतैव षोध पद्धति षोध कार्य की सफलता हेतु अत्यन्त आवष्यक है।

 

संदर्भ

1.      रावत हरिकृष्ण, (2013) सामाजिक शोध की विधियां, रावत पब्लिकेषन जयपुर।

2.      आहुजा रामकृष्ण, (2008) सामाजिक अनुसंधान, रावत पब्लिकेषन जयपुर।

3.      कौषिक आषा, (2004) (2011) नारी सषक्तीकरण विमर्ष एवं यथार्थ (द्वितीय परिवर्धित संस्करण), पोइन्टर पब्लिषर्स जयपुर।

4.      रामचन्द्रन बालकृष्णन (2008) महिला सषक्तिकरण में स्वयं सहायता समूह के प्रभाव का अध्ययन कन्याकुमारी अप्रकाषित शोध प्रबंध।

5.      सोनकर बेबी (2019), ग्रामीण महिलाओं में सामाजिक-आर्थिक रूपान्तरण का एक समाजवैज्ञानिक अध्ययन, अप्रकाषित शोध प्रबंध।

6.      महेष्वरी उमा(2020), महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी का अध्ययन चेन्नई शहर के विषेष सन्दर्भ में, अप्रकाषित शोध प्रबंध।

7.      https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8

8.      https://www.mpgkpdf.com/2021/10/volantary-organisation-kya-hote-hain.html

9.      https://www.indiatimes.com/hindi/women/women-commando-brigade-is-fighting-social-evils-572061.html

10.   https://hindi.news18.com/news/chhattisgarh/balod-story-womens-day-special-these-women-commandos-of-balod-have-been-running-liquor-campaign-for-15-years-chhsa-cgpg-2917807.html

 

 

Received on 15.09.2023        Modified on 04.10.2023

Accepted on 12.11.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(4):291-296.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00049